आयुर्वेद

'आयुर्वेद' नाम का अर्थ है, 'जीवन से सम्बन्धित ज्ञान'। आयुर्वेद, भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढ़ाने से है।

आयुर्वेद एक प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है

आयुर्वेद 5,000 वर्षों से भारत में प्रचलित है। यह शब्द संस्कृत के शब्द अयुर (जीवन) और वेद (ज्ञान) से आया है। आयुर्वेद, या आयुर्वेदिक चिकित्सा को कई सदियों पहले ही वेदों और पुराणों में प्रलेखित किया गया था।

आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार हमारा शरीर

आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार हमारा शरीर पांच तत्वों (जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु) से मिलकर बना है। वात, पित्त और कफ इन पांच तत्वों के संयोजन और क्रमपरिवर्तन हैं जो सभी निर्माण में मौजूद पैटर्न के रूप में प्रकट होते हैं।

पित्त शरीर की चयापचय प्रणाली के रूप में व्यक्त करता है

आग और पानी से बना है। यह पाचन, अवशोषण, आत्मसात, पोषण, चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। संतुलन में, पित्त समझ और बुद्धि को बढ़ावा देता है। संतुलन न होने से, पित्त क्रोध, घृणा और ईर्ष्या पैदा करता है।

शरीर का शुद्धिकरण

आयुर्वेद में पंचकर्म में एनीमा, तेल मालिश, रक्त देना, शुद्धिकरण और अन्य मौखिक प्रशासन के माध्यम से शारीरिक विषाक्त पदार्थों को समाप्त करने का अभ्यास है। आयुर्वेदिक हर्बल दवाओं में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले उपयुक्त घरेलू उपचार जीरा, इलायची, सौंफ और अदरक हैं जो शरीर में अपच को ठीक करते है।

सूखा रोग Rickets

 परिचय: सूखा रोग (रिकेटस) अधिकतर गरीब व्यक्तियों को होता है तथा इस रोग से ज्यादातर छोटे बच्चे ग्रस्त होते हैं। इस रोग को कुपोषण जन्य रोग भी कहते हैं।

सूखा रोग होने का लक्षण: जब किसी छोटे बच्चे को सूखा रोग (रिकेट्स) हो जाता है तो उसमें चिड़चिडापन, मांसपेशियां ठंडी होना, बेचैनी, फीकापन लगना, सिर से अधिक पसीना निकलना, दस्त, पेचिश तथा हडि्डयां कमजोर होना आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं। जब सूखा रोग से पीड़ित रोगी की रीढ़ की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं तो उसकी छाती में भी विकार हो जाते हैं, जिसके कारण रोगी बच्चे को चलने-फिरने तथा उठने-बैठने में परेशानी होने लगती है।

सूखा रोग होने का कारण: सूखा रोग बच्चों के शरीर में विटामिन `डी´ की कमी हो जाने के कारण होता है। विटामिन `डी´ के द्वारा ही शरीर में कैल्शियम तथा फास्फोरस की  पर्याप्त मात्रा बनी रहती है। कैल्शियम और फास्फोरस की कमी हो जाने के कारण शरीर की हडि्डयों को पोषण नहीं मिलता है जिसके कारण यह रोग बच्चे को हो जाता है।


सूखा रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:

सूखा रोग से अपने बच्चे को बचाने के लिए छोटे बच्चे जो कि 1 वर्ष से कम के होते हैं उन्हें कम से कम 1 वर्ष तक मां का दूध पिलाना चाहिए। उसके बाद बच्चे को गाय या बकरी का दूध पिलाना चाहिए।

जो स्त्री बच्चे को दूध पिलाती है उसे कैल्शियम तथा विटामिन `डी´ की मात्रा वाले पदार्थों का सेवन अधिक करना चाहिए ताकि उसके दूध में कैल्शियम तथा विटामिन `डी´ की भरपूर मात्रा बन सके।

यदि किसी बच्चे को यह रोग हो गया हो तो उस बच्चे को दूध में तिल मिलाकर पिलाना चाहिए। इससे सूखा रोग (रिकेटस) ठीक हो जाता है।

बच्चे को प्रतिदिन वायुस्नान तथा धूपस्नान करना चाहिए ताकि उसका यह रोग ठीक हो सके।

बच्चे की रीढ़ की हड्डी पर प्रतिदिन तेल की मालिश करनी चाहिए तथा उसके पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी कुछ समय के लिए करनी चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से सूखा रोग (रिकेटस) जल्दी ठीक हो जाता है।


फोड़ा छोटे तथा बड़े Absess

 परिचय: इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति के शरीर पर बड़े-छोटे दाने निकल जाते हैं जिनमें पीब तथा मवाद भरी रहती है। इस रोग के कारण फोड़े में गांठ भी पड़ जाती है तथा कुछ दिनों के बाद ये गांठ मुलायम पड़ जाती है तथा उसमें पीब और दूषित रक्त भर जाता है। इसी को फोड़ा कहते हैं। जब यह फूट जाता है तो इसमें से दूषित पदार्थ पीब और विषैला रक्त (खून) निकलने लगता है।

          फोड़ा छोटे तथा बड़े दोनों ही रूप में हो सकता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को बुखार तथा कब्ज की शिकायत भी हो सकती है। ये फोड़े कभी-कभी 2-3 दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं तो कुछ जल्दी ठीक नहीं होते हैं। जब फोड़ा फूट जाता है तो 7 से 10 दिनों तक यह सूख जाता है। जब फोड़े के साथ छेड़छाड़ करते है तो यह असाधारण रूप ले लेता है और यह नासूर, नहरूआ तथा कैंसर आदि रोगों का रूप ले लेता है और बहुत अधिक दर्दनाक हो जाता है।

फोड़ा होने का कारण: फोड़ा होने का सबसे प्रमुख कारण शरीर में दूषित द्रव्य का जमा हो जाना है। जब रक्त में दूषित द्रव्य मिल जाते हैं तो शरीर के किसी कमजोर भाग पर यह दाने के रूप में निकलने लगते हैं और उसमें मवाद या पीब भर जाती है। फोड़ा में गांठ भी बन जाती है तथा रोग ग्रस्त भाग कभी-कभी लाल रंग का हो जाता है और उस स्थान पर जलन, खाज तथा दर्द भी होने लगता है।


फोड़े का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

फोड़े का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति का फोड़ा जब तक पक न जाए तब तक उस पर प्रतिदिन 2-3 बार गुनगुना पानी छिड़कना चाहिए या फिर 10 मिनट तक 2-3 बार कम से कम 2 घण्टे तक बदल-बदल कर गर्म मिट्टी का लेप करना चाहिए या फिर कपड़े की गीली पट्टी करनी चाहिए। जब फोड़ा पक जाए तो उसे फोड़कर उसकी पीब तथा जहरीले रक्त को बाहर निकाल देना चाहिए। इसके बाद नीम की पत्तियों को पीसकर लेप बनाकर फोड़े पर लगाएं तथा कपड़े से पट्टी कर लें। इस प्रकार से प्रतिदन पट्टी करने से फोड़ा कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि उसका पेट साफ हो सके तथा दूषित द्रव्य उसके शरीर से बाहर निकल सके।

नींबू के रस को पानी में मिलाकर उस पानी से फोड़े को धोना चाहिए तथा इसके बाद फोड़े पर कपड़े की पट्टी कर लेनी चाहिए। जब फोड़ा पीबयुक्त हो जाए तो उस पर कम से कम 5 मिनट तक गर्म पानी में भीगे कपड़े की पट्टी करनी चाहिए। इसके बाद फोड़े को फोड़कर पीब तथा जहरीले रक्त को बाहर निकाल देना चाहिए और फिर इसके बाद ठंडे पानी में भीगे कपड़े से दिन में 3-4 बार सिंकाई करनी चाहिए। इससे फोड़ा जल्द ही ठीक हो जाता है।

जब फोड़ा फूट जाए तो दिन में 2 बार उस पर हल्की भाप देकर बलुई मिट्टी की भीगी गर्म पट्टी या कपड़े की भीगी पट्टी बदल-बदलकर लगानी चाहिए। इसके बाद जब उस पट्टी को खोलें तो उसे ठंडे पानी से धोकर ही खोलना चाहिए।

जब रोगी के शरीर में अधिक संख्या में फोड़े निकल रहे हों तो उस समय रोगी व्यक्ति को 2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा फलों का रस पीना चाहिए तथा दिन में गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को नींबू का रस पानी में मिलाकर पीना चाहिए। रोगी व्यक्ति को सप्ताह में 1 बार फोड़ों पर ठंडी पट्टी रखकर स्नान करना चाहिए तथा पैरों को गर्म पानी से धोना चाहिए। रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन 2 बार कटिस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए। रात के समय में रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर मिट्टी की गर्म पट्टी रखनी चाहिए। इसके अलावा रोगी को गुनगुने पानी से स्नान करना चाहिए तथा तौलिये से अपने शरीर को पोंछना चाहिए। फोड़े पर हरा प्रकाश देकर नीला प्रकाश भी देना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से फोड़ा जल्दी ठीक हो जाता है।

फोड़ों को मक्खी आदि से बचाने के लिए उन पर नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर लगाना चाहिए और इसके साथ-साथ इसका प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए। इससे फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जाता है।

सुबह के समय में नीम की 4-5 पत्तियां चबाने से फोड़ा जल्दी ही ठीक हो जाता है।


हकलाना तथा तुतलाना Stammering and Lisping

 परिचय: हकलाने या तुतलाने का रोग अधिकतर नाड़ियों में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न होने के कारण होता है। यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो एक हकलाने वाले व्यक्ति की नकल करते रहते हैं।

हकलाने तथा तुतलाने के लक्षण:  बोलते समय ठीक तरह से अक्षरों को न बोल पाना तथा रुक-रुककर बोलना, तुतलाने या हकलाने का रोग कहलाता है। कुछ रोगियों में तो हकलाहट जरा सी होती है, जो धीरे-धीरे अपने आप ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ मामलों में जब यह रोग पुराना हो जाता है तो रोगी को बोलने में बहुत परेशानी होती है।

हकलाना तथा तुतलाने का कारण: जब किसी व्यक्ति की पेशियों तथा स्नायुओं का नियंत्रण दोषपूर्ण हो जाता है तो वह व्यक्ति बोलते समय शब्दों का उच्चारण ठीक तरह से नहीं कर पाता है और वह रुक-रुककर बोलने लगता है। इस रोग के हो जाने के कारण रोगी की जीभ और होठों की आवश्यक गतिशीलता जो बोलने में उपयोग होती है तथा कठिनाई से पूरी होती है। इसके साथ ही स्वर यंत्र में आवाज पैदा हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति तुतलाने लगता है। हकलाने के रोग में व्यक्ति को हर शब्द में तो नहीं पर कुछ शब्दों को बोलने में परेशानी होती है।


हकलाने तथा तुतलाने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :

यदि कोई बच्चा हकलाने या तुतलाने के रोग से पीड़ित है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए, उसे कुछ दिनों तक आंवला चबाने के लिए देना चाहिए। जिसके फलस्वरूप रोगी की जीभ पतली होकर उसकी आवाज साफ निकलने लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में 10 भिगोए हुए बादाम को छीलकर और पीसकर मक्खन, मिश्री के साथ सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति यदि प्रतिदिन 10 कालीमिर्च के दाने और बादाम की गिरी को पीसकर मिश्री में मिलाकर चाटे तो उसका तुतलाने तथा हकलाने का रोग ठीक हो जाता है।

रोजाना गाय के घी में आंवले का चूर्ण मिलाकर चाटने से भी तुतलाना तथा हकलाना दूर हो जाता है।

छुहारे को दूध में उबालकर और चबाकर खा ले तथा इसके बाद दूध पी लें। इसके बाद दो घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए। इससे आवाज बिलकुल साफ हो जाती है। यह क्रिया कुछ दिनों तक प्रतिदिन करने से रोगी का तुतलाना तथा हकलाना ठीक हो जाता है।

तुतलाने तथा हकलाने का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (गाजर, सेब, चुकन्दर, अनन्नास, संतरा) पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद कुछ दिनों तक रोगी को फल, सब्जी, अंकुरित दाल का सेवन करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में कॉफी, चाय, मैदा, रिफाइण्ड, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

सोयाबीन को दूध में डालकर उसमें शहद मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से स्नायु की सूजन ठीक हो जाती है। इससे हकलाने तथा तुतलाने का रोग बिल्कुल ठीक हो जाता है।

पानी में नमक डालकर प्रतिदिन स्नान करने से रोगी का तुतलाने तथा हकलाने का रोग दूर हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में प्रतिदिन नियमित रुप से कोई हल्का व्यायाम करना चाहिए, जिससे स्नायु को शक्ति मिल सके और वह सही तरीके से अपना कार्य कर सके। इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में टहलने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को गहरी नींद लेनी चाहिए तथा कम से कम 7-8 घंटे तक सोना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराते समय अपनी सभी मानसिक परेशानियों, भय, चिंता आदि को दूर कर देना चाहिए।

यदि रोगी व्यक्ति किसी कार्य को करते समय जल्दी थक जाता हो तो उसे वह कार्य नही करना चाहिए।

प्रतिदिन शुष्कघर्षण आसन करने तथा इसके बाद साधारण स्नान करने से हकलाने तथा तुतलाने का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को झगड़ा-झंझट, वैवाहिक जीवन की असंगति, पारिवारिक क्लेश, आर्थिक कठिनाइयां, प्रेम सम्बन्धी निराशा, यौन सम्बन्धी कुसंयोजन तथा क्रोध, भय आदि मानसिक कारणों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इन सभी कारणों से रोग की अवस्था और भी गम्भीर हो सकती है।

शहद में कालीमिर्च मिलाकर प्रतिदिन चाटने से हकलाना तथा तुतलाना ठीक हो जाता है।

रात को सोते समय भुनी हुई फिटकरी को मुंह में रखकर सो जाएं और सुबह के समय में उठकर कुल्ला कर लें। इस क्रिया को लगभग एक महीने तक करने से हकलाने तथा तुतलाने का रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खाना खाने के बाद अपने मुंह में छोटी इलायची तथा लौंग रखनी चाहिए तथा जीभ को प्रतिदिन साफ करना चाहिए और यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे दूर करना चाहिए।

हकलाने और तुतलाने के रोग से पीड़ित रोगी को मन से भय की भावना बिल्कुल निकाल देनी चाहिए तथा मन को सबल बनाना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में शंख में पानी भरकर फिर सुबह के समय में उठकर उस पानी को प्रतिदिन पीने से यह रोग ठीक हो जाता है।

प्रतिदिन एनिमा लेने से तथा इसके बाद गुनगुने पानी से गरारा करने से रोगी का गला साफ हो जाता है और उसका तुतलाना तथा हकलाना बंद हो जाता है।

जबड़ों की पेशियों के कड़ेपन और होठों की गतिमन्दता के कारण भी हकलाने तथा तुतलाने का रोग हो जाता है, इसलिए रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को अपने हाथ की तर्जनी उंगुली को मुंह में डालकर नीचे के जबड़े को धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाना चाहिए। इसके बाद पेशियों को ढीला छोड़ देना चाहिए, जिससे जबड़ा अपने ही भार से नीचे की ओर चला जाए। जब यह क्रिया कर रहे हो उस समय गले में कोई गति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार के व्यायाम प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

हकलाने तथा तुतलाने के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को एक कुर्सी पर लिटाकर शरीर को सीधा तथा ढीला छोड़ देना चाहिए। उसके बाद चेहरे की पेशियों को ढीली करके जबड़े को नीचे गिरने देना चाहिए। इस अवस्था में रोगी व्यक्ति को अपनी जीभ मुंह की तली से सटाकर रखनी चाहिए। इस व्यायाम को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को अपने मुंह की पेशियों को ठीक करने के लिए प्रतिदिन शीशे के सामने 15 मिनट तक खड़े होकर या बैठकर जोर-जोर से कुछ पढ़ना चाहिए और उस समय गहरी सांस लेनी चाहिए। रोगी को पढ़ते समय प्रत्येक शब्द का उच्चारण सही करने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार प्रतिदिन करने से कुछ ही दिनों में हकलाने तथा तुतलाने का रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं। इन आसनों के करने से हकलाना तथा तुतलाना ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- उष्ट्रासन, हलासन, मण्डूकासन, मत्स्यासन, सुप्तवज्रासन, जानुशीर्षासन, सिंहासन, धुनरासन तथा खेचरी मुद्रा आदि।

किसी भी ठीक व्यक्ति को हकलाने वाले व्यक्ति की नकल नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उसे भी हकलाने की आदत पड़ सकती है।


हिचकी का रोग Hiccup

 परिचय: हिचकी का रोग किसी भी व्यक्ति को तब होता है जब उनके शरीर की तंत्रिकाएं उत्तेजित होकर जरूरत से ज्यादा सिकुड़ जाती हैं।


हिचकी को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

जब हिचकी आए तो उस समय एक गिलास गर्म पानी पीने से यह रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग को ठीक करने के लिए पेट की सिंकाई तथा पेट पर ठंडे लपेट का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा करने से पेट के डायाफ्रॉम पर दबाव कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप हिचकी बंद हो जाती है।

हिचकी आने पर लम्बी तथा गहरी सांस लेने से हिचकी बंद हो जाती है।

अपना ध्यान किसी दूसरी चीजों पर केन्द्रित करने से हिचकी आना बंद हो जाती है।

बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े को मुंह में रखकर चूसने से हिचकी आना बंद हो जाती है।

हिचकी आने पर 1 चम्मच चीनी या शहद का सेवन करने से यह रोग तुरंत ठीक हो जाता है।

एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच शहद डालकर उस पानी को पीने से हिचकी बंद हो जाती है।

छोटी इलायची और तुलसी के पत्तों को एकसाथ पीसकर पानी में मिलाकर पीने से हिचकी बंद हो जाती है।

2-3 लौंग को चबाकर उसके ऊपर पानी पीने से हिचकी बंद हो जाती है।


मलेरिया रोग Malaria

 परिचय: मलेरिया एक प्रकार का संक्रामक रोग है। यह रोग कई प्रकार के परजीवियों के द्वारा होता है। ये परजीवी मादा मच्छर के शरीर में होते हैं। इन परजीवियों को एनोफलीज कहते हैं।


मलेरिया रोग होने का कारण- जब मादा मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो ये एनोफलीज जीवाणु मच्छर के शरीर से व्यक्ति के खून में चले जाते हैं और व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं। कोई व्यक्ति मलेरिया रोग से पीड़ित हो उसे किसी मच्छर ने काट लिया हो और फिर वही मच्छर किसी दूसरे व्यक्ति को काट लेता है तो दूसरे व्यक्ति को भी मलेरिया रोग हो जाता है।


मलेरिया रोग के लक्षण-


मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को ठंड लगकर बुखार आता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर में दर्द भी होता रहता है।

जिस व्यक्ति को मलेरिया रोग होता है उसके पैरों में दर्द होता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को कुछ समय बाद पसीना आकर बुखार हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को चौथे दिन आने वाला बुखार भी हो सकता है तथा उसका बुखार जीवाणुओं के प्रकार पर निर्भर करता है।

मलेरिया रोग के कारण रोगी के शरीर मे खून की कमी भी हो जाती है।


मलेरिया रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-


मलेरिया रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को तब तक उपवास रखना चाहिए जब तक कि उसके शरीर सें मलेरिया रोग के लक्षण दूर न हो जाए। फिर इसके बाद दालचीनी के काढ़े में कालीमिर्च और शहद मिलाकर खुराक के रूप में लेना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

यदि किसी व्यक्ति को मलेरिया रोग के कारण बुखार है तो उसे लहसुन का काढ़ा बनाकर पिलाने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित व्यक्ति को उपवास रखने के बाद धीरे-धीरे फल खाने शुरू करने चाहिए तथा इसके बाद सामान्य भोजन सलाद, फल तथा अंकुरित दाल को भोजन के रूप में लेना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से मलेरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी के बुखार को ठीक करने के लिए रोगी को प्रतिदिन गुनगुने पानी का एनिमा देना चाहिए तथा इसके बाद उसके पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी लगानी चाहिए और फिर आवश्यकतानुसार गर्म या ठंडा कटिस्नान तथा जलनेति भी कराना चाहिए। इससे मलेरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

यदि मलेरिया रोग का प्रभाव बहुत तेज हो तो रोगी के माथे पर ठण्डी गीली पट्टी रखनी चाहिए तथा उसके शरीर पर स्पंज, गीली चादर लपेटनी चाहिए और फिर इसके बाद गर्म पादस्नान क्रिया करानी चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा उपचार करने से मलेरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को जिस समय बुखार तेज नहीं हो उस समय उसे कुंजल क्रिया करानी चाहिए। इससे मलेरिया रोग में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

यदि मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को ठंड लग रही हो तो रात को सोते समय उसके पास गर्म पानी की बोतल रखकर उसे कम्बल औढ़ा देना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

रोगी के शरीर पर घर्षण क्रिया करने से मलेरिया रोग बहुत जल्दी ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को पूर्ण रूप से विश्राम करना चाहिए तथा इसके बाद रोगी को अपना इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को सूर्यतप्त नीली बोतल का पानी हर 2-2 घंटे पर पिलाने से उसका बुखार जल्दी ठीक हो जाता।

शीतकारी प्राणायाम, शीतली, शवासन तथा योगध्यान करने से भी मलेरिया के रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित व्यक्ति को ठंडा स्पंज स्नान या ठंडा फ्रिक्शन स्नान कराने से उसके शरीर में फुर्ती पैदा होती है और उसका बुखार भी उतरने लगता है।

रोगी की रीढ़ की हड्डी पर बर्फ की मालिश करने से उसका बुखार कम हो जाता है मलेरिया रोग भी ठीक होने लगता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को खुले हवादार कमरे में रहना चाहिए। रोगी को हल्के आरामदायक वस्त्र पहनने चाहिए तथा उसे पूरी तरह आराम करना भी बहुत आवश्यक है।

जब रोगी व्यक्ति का बुखार उतर जाता है और उसकी जीभ की सफेदी कम हो जाती है तो उसे फलों का ताजा रस पीकर उपवास तोड़ देना चाहिए और इसके बाद फलों के ताजा रस, कच्चे सलाद, अंकुरित दालों व सूप का सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से रोगी को दुबारा बुखार नहीं होता है और मलेरिया रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को संतरे का रस दिन में 2 बार पीना चाहिए इससे उसका बुखार जल्दी ही ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को तुलसी के पत्तों का सेवन करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

तुलसी की पत्तियों को उबालकर उसमें कालीमिर्च पाउडर और थोड़ी चीनी मिलाकर पीने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को दूध नहीं पीना चाहिए लेकिन यदि उसे दूध पीने की इच्छा हो तो दूध में पानी और 1 चम्मच शहद मिलाकर पीना चाहिए परन्तु इसमें चीनी बिल्कुल भी नहीं मिलानी चाहिए। इस प्रकार से रोगी व्यक्ति का उपचार करने से मलेरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को अपने चारों ओर साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए और फिर प्राकृतिक चिकित्सा से अपना उपचार करना चाहिए।

मलेरिया रोग से पीड़ित रोगी को रात में मच्छरदानी लगाकर सोना चाहिए।


डेंगू ज्वर Dengu Fever

 परिचय: डेंगू ज्वर शरीर में दूषित द्रव्य के जमा हो जाने के कारण होता है और यह कई एक प्रकार के मच्छर के काटने से अधिक होता है। ये मच्छर पानी तथा गन्दगी की जगह पर अधिक होते हैं। डेंगू ज्वर को ब्रेक बोन बुखार तथा डेन्डी फ्यू और थ्री डे फीवर के नामों से भी जाना जाता है।


डेंगू ज्वर के लक्षण :-

डेंगू ज्वर अचानक होता है और इस रोग में तेजी से बुखार बढ़ने लगता है।

डेंगू ज्वर में बुखार ठीक होकर बार-बार होता रहता है।

जब किसी व्यक्ति को डेंगू ज्वर हो जाता है तो उसके शरीर के जोड़ों और हडि्डयों में दर्द होने लगता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी का मुंह लाल हो जाता है तथा उसके पूरे शरीर पर छोटी-छोटी फुन्सियां-सी निकलने लगती हैं। इसके अलावा इस रोग में रोगी को बेचैनी सी होने लगती है।

डेंगू ज्वर में रोगी का बुखार 102 डिग्री से लेकर 105 डिग्री तक पहुंच  जाता है।

वैसे तो डेंगू ज्वर के दौरान आने वाला बुखार 2-3 दिनों में ठीक हो जाता है लेकिन 3-4 दिनों के बाद यह बुखार वापस आ जाता है।

कभी-कभी तो इस रोग में रोगी को 1 महीने तक बुखार रहता है।


डेंगू ज्वर का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


डेंगू ज्वर को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को तब तक उपवास रखना चाहिए जब तक कि उसका बुखार दूर न हो जाए। फिर इसके बाद रोगी को दालचीनी के काढ़े में कालीमिर्च और शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

जब किसी व्यक्ति को डेंगू ज्वर हो जाता है तो उसे तुरंत ही लहसुन का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को उपवास रखने के बाद धीरे-धीरे फल खाने शुरू करने चाहिए तथा इसके बाद सामान्य भोजन सलाद, फल तथा अंकुरित दाल का सेवन करना चाहिए।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी के बुखार को ठीक करने के लिए प्रतिदिन रोगी को गुनगुने पानी का एनिमा देना चाहिए तथा इसके बाद उसके पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी लगानी चाहिए और फिर आवश्यकतानुसार उसे गर्म या ठंडा कटिस्नान कराना चाहिए तथा जलनेति क्रिया भी करानी चाहिए।

यदि डेंगू ज्वर में बुखार बहुत तेज हो तो रोगी के माथे पर ठण्डी गीली पट्टी लगानी चाहिए तथा उसके शरीर पर स्पंज, गीली चादर लपेटनी चाहिए और फिर इसके बाद उसे गर्म पादस्नान (पैरों को गर्म पानी से धोते स्नान करना) कराना चाहिए।

जिस समय रोगी व्यक्ति का बुखार तेज नहीं हो उस समय रोगी से कुंजल क्रिया करानी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

यदि डेंगू ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को बुखार के कारण ठण्ड लग रही हो तो उसके पास में गर्म पानी की बोतल रखकर कम्बल ओढ़ा देना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी के शरीर पर घर्षण क्रिया करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी को पूर्ण रूप से विश्राम करना चाहिए तथा इसके बाद अपना इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से कराना चाहिए।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी को सूर्यतप्त नीली बोतल का पानी दो-दो घंटे पर 25 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से बुखार जल्दी ठीक हो जाता है।

शीतकारी प्राणायाम, शीतली, शवासन तथा योगध्यान करने से भी डेंगू ज्वर के रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को ठंडा स्पंज स्नान या ठंडा फ्रिक्शन स्नान कराने से उसके शरीर में फुर्ती पैदा होती है और उसका बुखार भी उतरने लगता है और डेंगू ज्वर ठीक हो जाता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी की रीढ़ की हड्डी पर बर्फ की मालिश करने से उसका बुखार कम हो जाता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी को खुली हवादार जगह पर तथा हल्के आरामदायक वस्त्र पहनकर पूर्ण रूप से आराम कराना चाहिए।

जब डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी का बुखार उतर जाता है और उसके जीभ की सफेदी कम हो जाती है तब रोगी को फलों का ताजा रस पीकर उपवास तोड़ देना चाहिए और इसके बाद कच्चे सलाद, अंकुरित दालों व सूप का सेवन करना चाहिए। ऐसा करने से दुबारा डेंगू ज्वर नहीं होता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी को संतरे का रस दिन में 2 बार पीना चाहिए। इससे डेंगू ज्वर जल्दी ही ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को तुलसी के पत्तों का सेवन करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

तुलसी की पत्तियों को उबालकर उसमें कालीमिर्च पाउडर और थोड़ी चीनी मिलाकर पीने से डेंगू ज्वर में आराम मिलता है।

डेंगू ज्वर से पीड़ित रोगी को दूध नहीं पीना चाहिए लेकिन यदि उसे दूध पीने की इच्छा हो तो इसमें पानी मिलाकर हल्का कर लेना चाहिए तथा उसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर पीना चाहिए, इसमें चीनी बिल्कुल भी नहीं मिलानी चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा उपचार करने से डेंगू ज्वर जल्दी ही ठीक हो जाता है।


रक्ताल्पता रोग Anaemia

 परिचय: जब किसी व्यक्ति के खून में लाल कण कम हो जाते हैं तो व्यक्ति को रक्ताल्पता (खून की कमी) रोग हो जाता है और शरीर में खून की कमी हो जाती है।

रक्ताल्पता रोग होने का लक्षण-

जब किसी व्यक्ति को रक्ताल्पता (खून की कमी) रोग हो जाता है तो उसे कमजोरी अधिक महसूस होती है तथा उसके शरीर में खून की कमी हो जाती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी की याद्दाश्त कमजोर हो जाती है तथा उसे थकान अधिक महसूस होती है और रोगी व्यक्ति की सांस भी फूलने लगती है।

रोगी के सिर में चक्कर आने लगता है तथा उसे कोई भी कार्य करने का मन नहीं करता है। रोगी के नाखूनों का रंग सफेद हो जाता है और चेहरे की चमक भी खो जाती है।

रक्ताल्पता रोग होने का कारण:-


जब शरीर में लौहतत्व, प्रोटीन तथा विटामिन की कमी या फिर किसी रोग के कारण खून में लाल रक्तकणों का बनना बंद हो जाता है तो व्यक्ति को यह रोग हो जाता है।

किसी तरह की चोट, बवासीर तथा स्त्रियों में मासिकधर्म सम्बन्धित किसी रोग के हो जाने के कारण शरीर में रक्ताल्पता (खून की कमी) का रोग हो जाता है।

पेट में कीड़े हो जाने के कारण भी रक्ताल्पता (खून की कमी) का रोग हो सकता है।

अधिक मानसिक तनाव तथा चिंता पाचन रसों को प्रभावित करता है जिसके कारण शरीर में लौहतत्वों और विटामिनों की कमी हो जाती है और रक्ताल्पता (खून की कमी) का रोग हो जाता है।

किसी दुर्घटना के कारण शरीर से अधिक मात्रा में खून निकल जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।


रक्ताल्पता रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


रक्ताल्पता रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन पालक का रस शहद में मिलाकर पीना चाहिए या अनार का रस, अंगूर का रस, संतरे का रस, मौसमी का रस, गाजर का रस, पत्तागोभी का रस, अमरूद का फल, केला, टमाटर, सेब, चुकन्दर, पोदीना, पालक, हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए।

रक्ताल्पता रोग को ठीक करने के लिए अंजीर का सेवन बहुत ही उपयोगी है इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम में अंजीर का सेवन करना चाहिए।

शरीर में खून की कमी को दूर करने के लिए मुनक्का, हल्दी, मेथी तथा खजूर का सेवन बहुत लाभकारी है।

नीम की 2-3 पत्तियों को रोजाना सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर हो जाती है। इस रोग में गेहूं के जवारे का रस पीना भी बहुत लाभकारी होता है।

रक्ताल्पता रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुंजल क्रिया करनी चाहिए। इसके बाद रोगी को एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए और फिर पेट पर गर्म या ठंडा सेंक करना चाहिए। इसके बाद सूखा घर्षण तथा लंबी गहरी सांस लेनी चाहिए और फिर प्राणायाम, धूप स्नान, सूर्य नमस्कार, ज्ञानमुद्रा तथा प्राणमुद्रा करना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया रोगी को प्रतिदिन करनी चहिए जिसके परिणामस्वरूप यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन अपने शरीर पर मालिश करनी चाहिए।

रक्ताल्पता रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार की योगक्रिया तथा आसन हैं जिन्हें प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से यह रोग ठीक हो जाता है। ये आसन तथा योगक्रियाएं इस प्रकार हैं- सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्तानापादासन, शवासन, ध्यान, योगमुद्रासन तथा योगनिद्रा आदि।


निम्न रक्तचाप Low Blood Pressure

 परिचय: जब किसी व्यक्ति को लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) का रोग हो जाता है तो उसके शरीर की धमनियों के द्वारा रक्त की संचारण गति कम हो जाती है जिसके कारण से शरीर के अन्य भागों तथा मस्तिष्क के भागों में रक्त बहुत कम मात्रा में पहुंचता है और इन भागों का सही से विकास होना रुक जाता है। इस रोग के हो जाने के कारण शरीर में रक्त (खून) की मात्रा कम हो जाती है। यह रोग पुरुषों से ज्यादा स्त्रियों को होता है।


लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) रोग के लक्षण-


लो-ब्लडप्रेशर रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में हर समय सुस्ती सी छाई रहती है। रोगी व्यक्ति को किसी भी कार्य को करने में मन नहीं लगता है तथा उसे थकान अधिक महसूस होती है।

लो-ब्लडप्रेशर के रोग में रोगी की स्मरणशक्ति (याद्दाश्त) कम हो जाती है जिसके कारण रोगी व्यक्ति कुछ भी सोचने-समझने में असमर्थ रहता है। कभी-कभी तो रोगी व्यक्ति को चक्कर भी आने लगते हैं तथा उसे आत्महत्या करने का मन करता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी के सिर में हर समय दर्द होता रहता है।

रोगी की धड़कन की गति कम हो जाती है तथा उसे अधिक कमजोरी भी महसूस होने लगती है।

लो ब्लडप्रेशर रोग के कारण रोगी व्यक्ति को चिड़चिड़ापन, आलस्य, चक्कर आना, घबराहट महसूस होना, पसीना आना आदि समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की नाड़ी धीमी तथा कमजोर हो जाती है जिसे उंगुलियों से कलाइयों को दबाकर आसानी से महसूस किया जा सकता है।

लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) से पीड़ित रोगी कई बार चलते-चलते बेहोश होकर गिर पड़ता है।


लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) रोग होने का कारण-


लो ब्लडप्रेशर होने का सबसे प्रमुख कारण शरीर में विटामिन `बी´ तथा `सी´ की कमी होना है।

असंतुलित भोजन तथा गलत तरीके से खानपान के कारण रक्तचाप गिर जाता है और लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

शरीर में खून की कमी तथा क्षय (टी.बी.) रोग के कारण भी यह रोग हो सकता है।

लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) का रोग कई प्रकार के रोग होने के कारण भी हो सकता है जैसे- तेज उल्टिया होना, हैजा, टायफाइड तथा दस्त आदि।

आग से जलने के कारण या शरीर में तरल पदार्थों की कमी हो जाने के कारण भी लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

मानसिक कार्य की अधिकता या मानसिक भावुकता के कारण भी यह रोग हो सकता है।

पेट में कब्ज बनी रहने के कारण भी लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

स्त्रियों को मासिकधर्म से सम्बन्धित रोग हो जाने के कारण भी लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

अंत:स्रावी ग्रन्थियों में किसी प्रकार से विकृति आ जाने के कारण लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

किसी-किसी व्यक्ति को यह रोग आनुवंशिकता के कारण भी हो जाता है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। यह रोग व्यक्ति को उनके माता-पिता के रोगग्रस्त होने के कारण भी हो सकता है।

हृदय रोग होने के कारण रक्त संचारण में कमी आ जाती है जिसके कारण से हृदय की पेशी परिसंचरण में पर्याप्त खून नहीं पहुंच पाता है और व्यक्ति को लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

अधिक उपवास रखने के कारण भी यह रोग हो सकता है क्योंकि उपवास रखने से शरीर का भरपूर मात्रा में पोषण नहीं हो पाता है और लो ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।

भोजन में पौष्टिक पदार्थों का अभाव, ताजे फल तथा हरी साग-सब्जियों का सेवन न करने तथा बासी भोजन करने आदि के कारण भी यह रोग हो जाता है।

यह रोग व्यक्ति को तब भी हो जाता है जब वह अन्य रोगों से पीड़ित हो जैसे- शरीर में खून की कमी, हृदय धमनी रोग, टी.बी. रोग, टायफाइड तथा शोक आदि।


लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-


लो ब्लडप्रेशर रोग को ठीक करने के लिए दवाइयों का सेवन करना हानिकारक होता है इसलिए दवाइयों के सहारे लो ब्लडप्रेशर रोग का उपचार नहीं कराना चाहिए बल्कि इस रोग का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से कराना चाहिए।

लो ब्लडप्रेशर रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को अधिक से अधिक पानी पीना चाहिए तथा रसदार फलों का सेवन करना चाहिए।

रोगी को भोजन में उबली हुई सब्जियां, सब्जियों का सूप, दूध, शहद, दही तथा भिगोई हुई किशमिश, मुनक्का तथा चोकर समेत आटे की रोटी का सेवन करना चाहिए।

पुदीने का पानी तथा चुकन्दर का रस लो ब्लडप्रेशर रोग को ठीक करने में लाभदायक होता है।

तुलसी के ताजे पत्तों के रस में शहद मिलाकर पीने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

लो ब्लडप्रेशर रोग को ठीक करने के लिए रोगी को गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए ताकि उसका कब्ज रोग दूर हो सके। इसके बाद रोगी को अपने पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए तथा इसके बाद रीढ़ की हड्डी पर मालिश करनी चाहिए और अपने शरीर पर गीली चादर लपेटनी चाहिए। रोगी व्यक्ति को सप्ताह में एक बार वाष्पस्नान, गर्म पादस्नान करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को स्नान करने से पहले कम से कम 15 मिनटों तक सूखा घर्षण क्रिया करनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से लो ब्लडप्रेशर का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

लो ब्लडप्रेशर रोग को ठीक करने के लिए 25 ग्राम किशमिश तथा 50 ग्राम चनों को रात में सोते समय पानी में भिगोने के लिए रख दें तथा सुबह के समय में उठकर इसे चबा-चबाकर खा लें तथा इसके पानी को पी लें। प्रतिदिन इस प्रकार का प्रयोग करने से कुछ ही दिनों में यह रोग ठीक हो जाता है।

रोजाना ककड़ी तथा खीरे का रस पीने से लो ब्लडप्रेशर का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

मठे (लस्सी) में काला नमक, कालीमिर्च पाउडर तथा 2 चुटकी हींग डालकर प्रतिदिन पीने से लो ब्लडप्रेशर (निम्न रक्तचाप) रोग ठीक हो जाता है।

रोजाना आधा कप आंवला के रस में 2 चम्मच शहद डालकर पीने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

लो ब्लडप्रेशर रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में हरी घास पर नंगे पैर चलने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को ज्यादा सोच-विचार का कार्य नहीं करना चाहिए तथा अधिक से अधिक आराम करना चाहिए।


उच्च रक्तचाप High Blood Pressure

 परिचय: किसी भी मनुष्य को जीवित रहने के लिए उसके पूरे शरीर में रक्त संचारण होना बहुत ही आवश्यक है। शरीर में रक्त संचारण का कार्य धमनियों के द्वारा होता है जिसके फलस्वरूप शरीर के प्रत्येक भाग का पोषण होता है। धमनियों से कार्य कराने का कार्य हृदय के द्वारा होता है। हृदय एक पम्प की तरह खुलता और बंद होता रहता है और रक्त (खून) को रक्तवाहिनी, धमनियों तथा नलिकाओं में आगे बढ़ाता रहता है। हृदय के द्वारा रक्त को धमनियों में आगे बढ़ाने की क्रिया को रक्तचाप, खून का दबाव या ब्लडप्रेशर कहते हैं। यह क्रिया अगर रुक जाये तो मनुष्य का हृदय कार्य करना बंद कर देता है और उसकी मृत्यु हो जाती है।

          जब तक शरीर की धमनियों और रक्त-नलिकाओं की दशा स्वाभाविक रहती है अर्थात जब तक वे लचीली रहती हैं तब तक उनके छिद्र खुले रहते हैं तब तक रक्त (खून) को आगे बढ़ाने के लिए हृदय को ज्यादा दबाव डालने की आवश्यकता नहीं रहती है और रक्त अपने स्वाभाविक रूप से हृदय से निकलकर धमनियों और रक्त नलिकाओं द्वारा शरीर के प्रत्येक भाग में पहुंचता रहता है और इससे पूरे शरीर को पोषक तत्व प्राप्त होते रहते हैं।


          लेकिन जब धमनियों और रक्त-नलिकाओं के छिद्र संकरे हो जाते हैं तो हृदय को अधिक दबाव डालकर उन पतले छिद्र वाली तंग रक्त नलिकाओं से रक्त को आगे बढ़ाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है जिसके कारण वे नसें कमजोर हो जाती हैं और उच्च रक्तचाप या हाई ब्लडप्रेशर का रोग हो जाता है।


उच्च रक्तचाप रोग होने के लक्षण:-


          जब किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप का रोग हो जाता है तो चलते समय उस व्यक्ति के सिर व गर्दन के पीछे दर्द होने लगता है। रोगी में बेचैनी, मानसिक असंतुलन, सिर में दर्द, क्रोध, घबराहट, छाती में दर्द, चिड़चिड़ापन, किसी बात पर जल्दी उत्तेजित हो जाना, चेहरे पर तनाव होना आदि समस्याएं हो जाती हैं। यह रोग हो जाने के कारण रोगी का पाचनतन्त्र खराब हो जाता है जिसके कारण उसके द्वारा खाया हुआ खाना ठीक से पचता नहीं है। इसके अलावा रोगी की आंखे लाल हो जाती हैं, हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, रोगी को अनिद्रा रोग हो जाता है तथा उसकी नाक से खून निकलने लगता है। रोगी व्यक्ति का रक्तचाप सामान्य से अधिक हो जाता है।


उच्च रक्तचाप रोग होने का कारण:-


खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ जाने के कारण रक्तचाप सामान्य से अधिक हो जाता है।

जब अंत:स्रावी ग्रन्थियों की क्रिया ठीक से नहीं होती है तो रक्त का संचारण शरीर में सामान्य से अधिक हो जाता है जिसके कारण व्यक्ति को उच्च रक्तचाप का रोग हो जाता है।

कब्ज, अपच, मानसिक रोग, मधुमेह, पुराना आंव तथा मूत्र से सम्बन्धित रोग और गुर्दे का रोग हो जाने के कारण भी उच्च रक्तचाप का रोग हो सकता है।

चिंता, क्रोध, भय, असंयम तथा अपर्याप्त व्यायाम के कारण भी यह रोग हो सकता है।

धूम्रपान करने या नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी उच्च रक्तचाप का रोग हो सकता है।

मसाले, तेल, खटाई, तली-भुनी चीजें प्रोटीन, रबडी, मलाई, दाल, चाय, कॉफी आदि का सेवन करने के कारण भी उच्च रक्तचाप का रोग हो सकता है।

जल्दी-जल्दी खाना खाने तथा जरूरत से अधिक खाना खाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

गर्भावस्था में टोक्सिमिया रोग हो जाने के कारण भी रक्तचाप बढ़ जाता है।


उच्च रक्तचाप रोग हो जाने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


उच्च रक्तचाप रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए। फिर इसके बाद इस रोग का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।

उच्च रक्तचाप के रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (गाजर का रस, केले के तने का रस, चुकन्दर का रस, बथुए का रस, धनिया-पालक का रस, खीरे का रस, नारियल पानी, नींबू का रस पानी में डालकर, घिये का रस तथा गेहूं के ज्वारे का रस) पीना चाहिए। इसके अलावा कुछ समय तक बिना पका हुआ भोजन करने से भी यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को चोकर समेत आटे की रोटी तथा सब्जियां खानी चाहिए।

तुलसी के पत्ते को कालीमिर्च के साथ प्रतिदिन खाने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

प्रतिदिन सुबह के समय में खाली पेट तुलसी के पत्ते को शहद के साथ सेवन करने से भी उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

प्रतिदिन सुबह के समय नींबू का रस तथा 1 चम्मच शहद पानी में मिलाकर पीना बहुत ही लाभकारी होता है जिसके फलस्वरूप उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

रात को सोते समय तांबे के बर्तन में पानी रख दें। सुबह के समय में इस पानी को पीने से रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

ताजे आंवले का रस 2 चम्मच प्रतिदिन सुबह तथा शाम को पीने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

3 भाग गाजर के रस में 1 भाग पालक का रस मिलाकर प्रतिदिन पीने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

5-6 बूंद लहसुन का रस पानी में मिलाकर दिन में 4 बार पीने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

मुनक्का या शहद के साथ कच्चा लहसुन प्रतिदिन खाने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को घी, नमक, मिर्च-मसाला, अचार तथा मिठाई नहीं खाने चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन फलों का रस पीकर 1 सप्ताह तक उपवास रखने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को उन चीजों का अधिक सेवन करना चाहिए जिनमें विटामिन `सी´ तथा पोटाशियम की मात्रा अधिक हो।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम को खुली हवा में टहलना चाहिए तथा 50 से 100 बार गहरी सांस लेनी चाहिए।

उच्च रक्तचाप के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन ठंडे पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए तथा पेट पर मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए। फिर गर्म ठंडा सेंक करना चाहिए। इसके बाद गर्म पादस्नान, रीढ़स्नान, कटिस्नान, मेहनस्नान तथा सप्ताह में 1 दिन गीली चादर लपेट स्नान करना चाहिए और स्नान से पहले और बाद में शरीर को रगड़ना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

उच्च रक्तचाप को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिनको करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है जैसे- गोमुखासन, शवासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, वज्रासन, पदमासन, सिद्धासन, ताडासन, नाड़ीशोधन, शीतकारी तथा शीतली प्राणायाम बिना कुम्भक आदि।

उच्च रक्तचाप को सामान्य करने के लिए कुछ योगक्रियाएं भी हैं जिन्हें करने से यह रोग ठीक हो सकता है जैसे- ज्ञानमुद्रा, योगनिद्रा।

जलनेति, कुंजल तथा शवासन क्रिया करने से भी उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

रीढ़ की हड्डी तथा सिर पर 5-10 मिनट तक मालिश करने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

सुबह के समय आधा लीटर सूर्यतप्त हरी बोतल का पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में करके पीने से यह रोग कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।

सूर्य तप्त नीले तेल से शरीर की मालिश करने से भी यह रोग ठीक हो जाता है। रोगी के हृदय पर अधिक मालिश करनी चाहिए तथा रोगी व्यक्ति के मानसिक तनावों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

बेलपत्र का काढ़ा बनाकर दिन में 3 बार पीने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

प्रतिदिन 2 संतरे छीलकर खाने तथा फलों में अमरूद, नाशपाती, सेब, आम, जामुन, अनन्नास, खरबूजा, खजूर तथा रसभरी खाने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

गाय या बकरी के दूध जिसमें मलाई न हो, को पीने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

रोगी व्यक्ति के पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी या तौलिये को पानी में भिगोकर फिर निचोड़कर 10 मिनट तक रखने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 1 बार एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी के शरीर पर दिन में एक बार सूखी मालिश करें और इसके बाद गीले तौलिए से शरीर को पोंछें। इससे रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कम से कम 7-8 घण्टे की नींद लेनी चाहिए।

उच्च रक्तचाप से पीड़ित रोगी को रूद्राक्ष अच्छी तरह से धोकर रात को 1 गिलास पीने के पानी में डालकर ढक देना चाहिए। फिर सुबह के समय में रूद्राक्ष को निकालकर इस पानी को पी लेना चाहिए। इसके बाद 1 गिलास पानी में रूद्राक्ष डालें व शाम को वह पानी पी लें। इस प्रकार प्रतिदिन यह पानी दिन में 2 बार पीने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।