आयुर्वेद

'आयुर्वेद' नाम का अर्थ है, 'जीवन से सम्बन्धित ज्ञान'। आयुर्वेद, भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढ़ाने से है।

आयुर्वेद एक प्राचीन चिकित्सा विज्ञान है

आयुर्वेद 5,000 वर्षों से भारत में प्रचलित है। यह शब्द संस्कृत के शब्द अयुर (जीवन) और वेद (ज्ञान) से आया है। आयुर्वेद, या आयुर्वेदिक चिकित्सा को कई सदियों पहले ही वेदों और पुराणों में प्रलेखित किया गया था।

आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार हमारा शरीर

आयुर्वेदिक दर्शन के अनुसार हमारा शरीर पांच तत्वों (जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु) से मिलकर बना है। वात, पित्त और कफ इन पांच तत्वों के संयोजन और क्रमपरिवर्तन हैं जो सभी निर्माण में मौजूद पैटर्न के रूप में प्रकट होते हैं।

पित्त शरीर की चयापचय प्रणाली के रूप में व्यक्त करता है

आग और पानी से बना है। यह पाचन, अवशोषण, आत्मसात, पोषण, चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। संतुलन में, पित्त समझ और बुद्धि को बढ़ावा देता है। संतुलन न होने से, पित्त क्रोध, घृणा और ईर्ष्या पैदा करता है।

शरीर का शुद्धिकरण

आयुर्वेद में पंचकर्म में एनीमा, तेल मालिश, रक्त देना, शुद्धिकरण और अन्य मौखिक प्रशासन के माध्यम से शारीरिक विषाक्त पदार्थों को समाप्त करने का अभ्यास है। आयुर्वेदिक हर्बल दवाओं में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले उपयुक्त घरेलू उपचार जीरा, इलायची, सौंफ और अदरक हैं जो शरीर में अपच को ठीक करते है।

वात रोग Rheumatism

 परिचय: वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं। शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है। हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।


वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-


उदान वायु        - यह कण्ठ में होती है।

अपान वायु       - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।

प्राण वायु         -  यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।

व्यान वायु        - यह पूरे शरीर में होती है।

समान वायु       - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।


वात रोग के प्रकार :


आमवात : आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।


सन्धिवात : जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।


गाउट : गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।


मांसपेशियों में दर्द : इस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।


गठिया : इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।


वात रोग के लक्षण :


वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।

रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।

रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।

रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।


वात रोग होने का कारण :


वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है।

भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।

जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।

पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।

जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।

जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।

ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।


वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :


वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।

कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।

कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।

वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है।

शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है।

वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।


जलोदर Dropsy

 परिचय: जब किसी व्यक्ति को जलोदर (पेट में पानी भरना) रोग हो जाता है तो इस रोग के कारण रोगी के पेट में दूषित पानी जमा हो जाता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को साधारण पानी पचता नहीं है। जब यह रोग बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो रोगी के मुंह और हाथ-पैरों पर बहुत अधिक सूजन आ जाती है तथा कभी-कभी रोगी को बुखार भी हो जाता है। इस रोग में रोगी के मलद्वार के पास अंगुली से दबाने से गड्ढा सा पड़ जाता है।


जलोदर रोग होने का कारण- जब किसी व्यक्ति के जिगर, पित्ताशय, गुर्दे और हृदय कमजोर हो जाते हैं तो वे अपना कार्य ठीक प्रकार से नहीं करते हैं जिसके कारण शरीर में जो खून होता है वह पिघल कर पानी बन जाता है और शरीर के किसी भाग के तंतुओं या गह्नर में जमा होकर जलोदर रोग की उत्पत्ति करता है। इसके कारण पानी रोगी के पूरे शरीर में या शरीर के किसी एक भाग खासकर पेट में जमा हो जाता है। जब शरीर से मल का निष्कासन ठीक प्रकार से नहीं होता या शरीर में से मूत्र तथा पसीने रुकने के कारण इसकी मात्रा बढ़ जाती है तब यह रोग हो जाता है।


लक्षण- जलोदर रोग में रोगी के पेट में बहुत अधिक मात्रा में पानी जमा होने के कारण उसका पेट फूल जाता है।


जलोदर रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-


इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी को ऐसे पदार्थ अधिक खाने चाहिए जिनसे कि पेशाब अधिक मात्रा में आए तथा पेशाब साफ हो।

जलोदर रोग से पीड़ित रोगी को अपनी पाचनक्रिया को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए क्योंकि जब पाचनक्रिया ठीक हो जाएगी तभी यह रोग ठीक हो सकता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को पानी पीना बंद कर देना चाहिए तथा भोजन भी बंद कर देना चाहिए। यदि रोगी व्यक्ति को प्यास लग रही हो तो उसे दही का पानी, मखनियां, ताजा मट्ठा, फलों का रस तथा गाय के दूध का मक्खन देना चाहिए। इसके अलावा रोगी को और कुछ भी सेवन नहीं करना चाहिए।

यदि रोगी अधिक कमजोर नहीं है तो उसे एक दिन उपवास रखना चाहिए।

रोगी के पेट में जहां पर सूजन आ रही हो वहां पर प्रतिदिन 1-2 बार मिट्टी की गीली पट्टी लगानी चाहिए। रोगी को कुछ दिनों तक सोने से पहले प्रतिदिन गुनगुने पानी का एनिमा लेकर पेट को साफ करना चाहिए। इस क्रिया को सुबह के समय उठने के बाद भी किया जा सकता है।

यदि रोगी का हृदय बहुत अधिक कमजोर है तो उसके हृदय के पास एक दिन में 3 बार कम से कम 25 मिनट तक कपड़े की ठंडी पट्टी रखनी चाहिए। जब रोगी के हृदय के पास की पट्टी को हटाते हैं तब उस स्थान को मलकर लाल कर लेना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खुली तथा साफ जगह पर रहना चाहिए।

जलोदर रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में सूर्य के प्रकाश के सामने बैठकर पेट की सिंकाई करनी चाहिए। यह क्रिया कम से कम आधे घण्टे के लिए करनी चाहिए। उपचार करते समय रोगी व्यक्ति को नारंगी रंग का शीशा अपने पेट के सामने इस प्रकार रखना चाहिए कि उससे गुजरने वाले नीले रंग का प्रकाश सीधा पेट पर पड़े।

जलोदर रोग से पीड़ित रोगी को नारंगी रग की बोतल के सूर्यतप्त जल को लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन दिन में 6 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।


हैजा रोग Cholera

 परिचय:-


हैजा रोग को कई और नाम से भी जाना जाता है जैसे- विसूचिका, कालरा, उलाउठा तथा कै-दस्त आदि। इस रोग के और भी कई रूप हैं जो इस प्रकार हैं- अलसक रोग, विलिम्बका तथा विसूचिका।

          जब किसी व्यक्ति को हैजा रोग हो जाता है तो उसे उल्टियां और दस्त होने लगती है और उसके पेट तथा पैरों में ऐंठन होने लगती है। इस रोग से पीड़ित रोगी का शरीर ठंडा पड़ जाता है। रोगी की नाड़ी मंद पड़ जाती है। इस रोग के हो जाने के कारण रोगी के शरीर में पानी की कमी हो जाती है जिसके कारण उसके शरीर में कमजोरी आ जाती है। यह रोग बिना अजीर्ण रोग हुए नहीं होता है। जिस अजीर्ण में सुई चुभने जैसी पीड़ा (दर्द) होती है उसे हैजा कहते हैं।


          जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके शरीर में पेशाब बनकर मूत्राशय में नहीं आ पाता है और शरीर की भीतरी गर्मी के कारण उसका बस्ति स्थान शुष्क हो जाता है जिसके कारण रोगी को पेशाब आना बंद हो जाता है। इसलिए जब तक इस रोग से पीड़ित रोगी का पेशाब आना दुबारा से शुरू नहीं हो जाता तब तक इस रोग का खतरा टला हुआ नहीं समझना चाहिए। इस रोग का जल्दी ही इलाज नहीं किया जाए तो रोगी व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।


हैजा रोग के लक्षण-


हैजा रोग से पीड़ित रोगी को उल्टियां और पीले रंग के पतले दस्त होने लगते हैं तथा उसके शरीर में ऐंठन तथा दर्द होने लगता है।

रोगी व्यक्ति को पेट में दर्द, बेचैनी, प्यास, जम्भाई, जलन तथा हृदय और सिर में दर्द होने लगता है।

हैजा रोग के कारण रोगी व्यक्ति का शरीर ठंडा तथा पीला पड़ जाता है और उसकी आंखों के आगे गड्ढ़े बन जाते हैं।

इस रोग से पीड़ित रोगी के होंठ, दांत और नाखून काले पड़ जाते हैं।

कभी-कभी तो इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की हडि्डयां अपने जोड़ों पर से काम करना बंद कर देती है।

हैजा रोग होने का कारण-


यह एक प्रकार का संक्रामक रोग है जो कई प्रकार की मक्खियों तथा दूषित पानी से फैलता है।

इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण गलत तरीके से खान-पान तथा दूषित भोजन का सेवन करना है।

दूषित भोजन के कारण शरीर में दूषित द्रव्य जमा होने लगता है जिसके कारण हैजा रोग हो जाता है।

हैजा रोग अक्सर अजीर्ण (बदहजमी) रोग के हो जाने के कारण होता है।

यदि किसी व्यक्ति की पाचनक्रिया खराब हो जाती है तो भी उसको यह रोग हो सकता हैं।

हैजा रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-


हैजा रोग से पीड़ित रोगी को पानी में नींबू या नारियल पानी मिलाकर पीना चाहिए ताकि उसके शरीर में पानी की कमी पूरी हो सके और उल्टी करते समय दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल सके।

इस रोग से पीड़ित रोगी को पुदीने का पानी पिलाने से भी बहुत अधिक लाभ मिलता है।

लौंग को पानी में उबालकर रोगी को पिलाने से हैजा रोग ठीक होने लगता है।

तुलसी की पत्ती और कालीमिर्च पीसकर सेवन कराने से हैजा रोग ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्याज तथा नींबू का रस गर्म पानी में मिलाकर पिलाने से हैजा रोग ठीक हो जाता है।

हैजा रोग को ठीक करने के लिए रोगी के पेट पर गीली मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए तथा इसके बाद रोगी को एनिमा क्रिया करानी चाहिए ताकि उसका पेट साफ हो सके। फिर इसके बाद रोगी को गर्म पानी से गरारे कराने चाहिए और इसके बाद उसे कटिस्नान कराना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से हैजा रोग ठीक होने लगता है।

हैजा रोग से पीड़ित रोगी जब तक ठीक न हो जाए तब तक उसे नींबू के रस को पानी में मिलाकर पिलाते रहना चहिए और उसे उपवास रखने के लिए कहना चाहिए। यदि रोगी व्यक्ति को कुछ खाने की इच्छा भी है तो उसे फल खाने के लिए देने चाहिए।

हैजा रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए फिर इसके बाद इसका उपचार कराना चाहिए।

हैजा रोग को ठीक करने के लिए किसी प्रकार की दवाईयों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को स्वच्छ स्थान पर रहना चाहिए जहां पर हवा और सूर्य की रोशनी ठीक तरह से प्राप्त हो सके।

इस रोग से पीड़ित रोगी को जब प्यास लग रही हो तो उसे हल्का गुनगुना पानी देना चाहिए।

हैजा रोग से पीड़ित रोगी के हाथ-पैर जब ऐंठने लगे तो उसके हाथ तथा पैरों को गर्म पानी में डुबोकर रखना चाहिए फिर उस पर गर्म कपड़ा लपेटना चाहिए।

हैजा रोग को ठीक करने के लिए नीली बोतल के सूर्य तप्त जल की 28 मिलीलीटर की मात्रा में नींबू का रस मिलाकर 5 से 10 मिनट के बाद रोगी को लगातार पिलाते रहना चाहिए। यह पानी रोगी को तब तक पिलाते रहना चाहिए जब तक कि रोगी को उल्टी तथा दस्त होना बंद नहीं हो जाते हैं।

हैजा रोग से बचने के उपाय-


इस रोग से बचने के लिए कभी भी अजीर्ण रोग (बदहजमी) नहीं होने देना चाहिए।

इस रोग से बचने के लिए मैले तथा भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर कभी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।

व्यक्ति को कभी-भी मलत्याग करने वाली जगह पर नहीं रहना चाहिए।

बासी खाद्य पदार्थों, सड़े-गले खाद्य पदार्थों तथा खुले हुए स्थान पर रखी मिठाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए।

ऐसे कुएं तालाबों तथा जलाशयों के जल को कभी भी पीना नहीं चाहिए। जिनके आस-पास गंदगी फैली हो या फिर जिनका पानी गंदा हो।

गर्मी के दिनों में लू चलती है, उससे बचकर रहना चाहिए तथा धूप में बाहर नहीं निकलना चाहिए।

जब भोजन कर रहे हो तो उस समय पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि भोजन करने के 2 घण्टे बाद पानी पीना चाहिए।

भोजन हमेशा सादा करना चाहिए तथा आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए।

हैजा रोग से बचने के लिए भोजन भूख से अधिक नहीं करना चाहिए।

हैजा रोग से बचने के लिए भोजन में प्याज, पोदीना, नींबू तथा पुरानी पकी इमली का सेवन करना चाहिए।

हैजा रोग से बचने के लिए सभी व्यक्तियों को प्रतिदिन एक या आधा नींबू का रस पानी में मिलाकर पीना चाहिए। इस पानी को पीने से खून साफ हो जाता है और हैजा होने का डर बिल्कुल भी नहीं रहता है।

खाने वाली चीजों को हमेशा ढककर रखना चाहिए ताकि इन चीजों पर मक्खियां न बैठ सकें।

रात के समय में अधिक जागना नहीं चाहिए।

अधिक काम करने से बचना चाहिए ताकि शरीर में थकावट न हो सके।

संभोग करने की गलत नीतियों से बचे क्योंकि गलत तरीके से संभोग करने से भी हैजा रोग हो सकता है।


अपच रोग Indigestion

 परिचय:-


अपच रोग आमाशय या आंतों के ठीक से काम न करने के कारण होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को खाया-पिया भोजन पचता नहीं है तथा उसे खट्टी डकारे आने लगती है। अपच रोग साधारण हो या बहुत अधिक यह आमाशय और आंतों की बहुत सारी बीमारियों के होने का कारण बनता है। आमाशय और आंतों की बहुत सारी बीमारियों से बचने के लिए रोगी व्यक्ति को अपच रोग का जल्दी से उपचार कराना चाहिए, नहीं तो यह बीमारी और भी रोगों को जन्म दे सकती है जैसे- जी मिचलाना, डकारें आना, उल्टी आना, हृदय में जलन, पेट में दर्द तथा मरोड़, अम्ल, मुंह में घाव होना, मसूढ़ों से खून आना आदि। यदि यह रोग बहुत अधिक हो जाता है तो रोगी को डायरिया या कब्ज जैसे रोग भी हो सकते हैं।

          यदि इस रोग के होने का कारण पता लग जाए तो बीमारी के लक्षणों का उपचार हो सकता है। यदि इस रोग के होने का कारण पता न लगे तो भी इस रोग का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से हो सकता है। इस रोग के होने का सीधा संबन्ध हमारे भोजन करने के तरीके तथा भोजन संबन्धी आदतों से होता है। यदि हम अपने भोजन करने के तरीके तथा भोजन संबन्धी आदतों में सुधार करते हैं तो यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।


अपच रोग होने का लक्षण :-


अपच रोग से पीड़ित रोगी को भूख नहीं लगती है तथा उसके मुंह से बिना पचा भोजन बाहर आने लगता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी-खट्टी डकारे आने लगती हैं तथा उसका जी मिचलाने लगता है और उसका कुछ भी खाने का मन नहीं करता है।

रोगी व्यक्ति के गले तथा हृदय में जलन होने लगती है और उसकी सांसों से बदबू आने लगती है तथा पेट में गैस बनने लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी अगर थोड़ा सा भी खाना खा लेता है तो उसका पेट भारी होने लगता है तथा पेट और छाती में दर्द होने लगता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी उल्टियां भी होने लगती है और उसकी जीभ पर मैल जम जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कब्ज भी होने लगती है तथा जब इस रोग की अवस्था अधिक गंभीर हो जाती है तो उसे डायरिया जैसे रोग जाते हैं।

इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को और भी कई प्रकार के रोग हो जाते हैं जो इस प्रकार हैं- आंतों में सूजन, जिगर की बीमारियां, एपेन्डिसाइटिस, बड़ी आंतों में सूजन, आंतों में घाव तथा गुर्दे की बीमारियां आदि।

अपच रोग होने का कारण :-


प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार अपच रोग उस व्यक्ति को हो जाता है जो अपनी भूख से अधिक भोजन करता है, जल्दी-जल्दी भोजन करता है तथा खाना ठीक से चबाकर नहीं खाता है।

अपच रोग कई प्रकार के गरिष्ठ (भारी तथा दूषित भोजन), तैलीय भोजन, बासी तथा सड़े-गले खाद्य पदार्थों का भोजन में उपयोग करने के कारण होता है।

अपच रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो भोजन करने के तुरंत बाद काम में लग जाते हैं।

भय, चिंता, ईर्ष्या, क्रोध, तनाव से ग्रस्त व्यक्तियों को यह रोग जल्दी हो जाता है।

भोजन के साथ-साथ पानी पीना, चाय का अधिक सेवन करना, कॉफी, साफ्ट ड्रिंक तथा शराब आदि का अधिक सेवन करने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।

अधिक धूम्रपान करने, सही समय पर भोजन न करने तथा काम न करने के कारण भी अपच रोग हो सकता है।

बार-बार बिना भूख लगे ही खाना खाने के कारण भी यह रोग हो जाता है।

ठीक समय पर खाना न खाने अथार्त खाने खाने का कोई निश्चित समय न होने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।

गलत तरीके से खान-पान तथा जल्दी-जल्दी खाना खाने तथा तनाव में खाना खाने के कारण भी यह रोग हो जाता है।

भोजन करते समय कोई मानसिक परेशानी तथा भावनात्मक रूप से परेशान रहने के कारण भी अपच रोग हो जाता है।

कब्ज बनने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

अत्यधिक सिगरेट पीने के कारण भी यह रोग हो जाता है।

जब शरीर में भोजन को जल्दी पचाने वाले एन्जाइम में कमी हो जाती है तो भी यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।

अपच रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


1. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी के अपच रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इसके होने के कारणों को दूर करना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी को 1 से 3 दिनों तक रसाहार (नारियल पानी, संतरा, अनन्नास, अनार, नींबू पानी और कई प्रकार के फलों का रस) पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद कुछ दिनों तक रोगी को फलों का सेवन करना चाहिए तथा इसके बाद सामान्य भोजन का सेवन करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।


2. रोगी व्यक्ति को मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य, मिठाइयों, चीनी, मैदा आदि का भोजन में उपयोग नहीं करना चाहिए तभी अपच रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।


3. इस रोग से पीड़ित रोगी को बार-बार भोजन नहीं करना चाहिए बल्कि भोजन करने का समय बनाना चाहिए और उसी के अनुसार भोजन करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को भोजन उतना ही करना चाहिए जितना कि उसकी भूख हो। भूख से अधिक भोजन कभी भी नहीं करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को भोजन कर लेने के बाद सोंफ खानी चाहिए और तुरंत पेशाब करना चाहिए और इसके बाद वज्रासन पर बैठ जाना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।


4. रोगी व्यक्ति को अपनी पाचनशक्ति को बढ़ाने के लिए तुलसी के पत्तों या पुदीने के पत्ते पीसकर पानी में घोलकर पीना चाहिए।


5. रोगी व्यक्ति के रोग को ठीक करने के लिए पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान कराना चाहिए। फिर रोगी को कुंजल क्रिया तथा जलनेति क्रिया करानी चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।


6. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसनों का उपयोग किया जा सकता है और ये आसन इस प्रकार हैं-


अर्धमत्स्येन्द्रासन,

उत्तानपादासन,

सुप्त पवनमुक्तासन

योगमुद्रासन,

सर्वांगासन

चक्रासन,

वज्रासन,

शवासन,

भुजंगासन


इन सभी यौगिक क्रियाओं को करने से रोगी का अपच रोग ठीक हो जाता है तथा इसके अलावा योग मुद्रा, कपालभाति, लोम अनुलोम, उज्जायी प्राणायाम करने से भी रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।


1. अपच रोग से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।


2. रोगी व्यक्ति को अपना उपचार कराने से पहले वसायुक्त खाद्य पदार्थ, कॉफी, चाय, शराब, धूम्रपान तथा उच्च प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को सेवन नहीं करना चाहिए।


3. इस रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट पर गर्म तथा ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए। इसके फलस्वरूप पेट में दर्द तथा गैस बनना बंद हो जाती है तथा यह रोग ठीक हो जाता है।


4. अपच रोग को ठीक करने के लिए गैस्ट्रो-हैपेटिक लपेट का इस्तेमाल करना चाहिए जिसके फलस्वरूप दर्द से आराम मिलता है और इस रोग से रोगी को आराम मिलता है।


5. पेट के अवयवों में रक्त संचार को सुधारने के लिए मिट्टी लपेट का उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रक्त संचार में सुधार हो जाता है और इस रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।


6. अपच रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कम से कम 40 से 60 मिनट तक पेट पर ठंडा लपेट करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत आराम मिलता है और रोग ठीक हो जाता है।


7. इस रोग से पीड़ित रोगी को पेट के बल लेटना चाहिए तथा पवनमुक्तासन का अभ्यास करना चाहिए। इसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।


8. इस रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले नींबू के रस में पानी को मिलाकर दिन में कम से कम 3-4 बार पीना चाहिए तथा कम से कम 3 दिन तक उपवास रखना चाहिए और कटिस्नान करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को अपने पेट को साफ करने के लिए पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाए।


पेट में कीड़े Stomach Worm

 परिचय: शरीर के अन्दर आंतों की सफाई अच्छी प्रकार से न होने के कारण पेट में कीड़े हो जाते हैं जो मल के साथ गुदा-द्वार से बाहर निकलते हैं। ये कीड़े आकार में चावल भर की लम्बाई से लेकर 2 फुट तक लम्बे होते हैं और जब इनकी संख्या पेट में अधिक हो जाती है तो ये कभी-कभी मुंह से भी बाहर आ जाते हैं। ये कीड़े शरीर में खान-पान की गड़बड़ी के कारण से होते हैं। जब पेट में कीड़े हो जाते हैं तो रोगी व्यक्ति के पेट में कभी-कभी सूजन भी हो जाती है तथा पेट में दर्द भी होने लगता है।

पेट के कीड़ों को मारकर पेट से बाहर निकालने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-


गुनगुने पानी में नींबू का रस तथा सेंधानमक मिलाकर इस पानी से सुबह के समय में प्रतिदिन एनिमा क्रिया करनी चाहिए तथा इसके आधे घण्टे के बाद खुली हवा में हल्का व्यायाम करना चाहिए और केवल रोटी, कच्ची सब्जियां तथा फलों का भोजन करना चाहिए। लेकिन जब रोगी का यह रोग बहुत अधिक पुराना हो गया हो तो कम से कम 10 से 12 दिनों तक रोगी को केवल फल खिलाने चाहिए तथा पेट जब तक साफ न हो तब तक एनिमा लेना चाहिए। रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में घर्षणस्नान करना चाहिए इसके बाद रोगी को साधारण स्नान करना चाहिए और सुबह तथा शाम के समय में उदरस्नान करना चाहिए। रोगी को सप्ताह में 2 बार एप्सम साल्टबाथ भी दिया जाए तो यह रोग जल्द ही दूर हो जाता है।

रोगी के पेट के कीड़ों को मारने के लिए गुदाद्वार में तेल डालना चाहिए ताकि तेल गुदाद्वार से होते हुए आंतों में पहुंच जाए। इससे आंतों के कीड़े मर जाते हैं।

पीली बोतल के सूर्यतप्त जल का 3 भाग और हरी बोतल का सूर्यतप्त जल 1 भाग मिलाकर 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन दिन में 6 बार सेवन करने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

अमर बेल को पीसकर पेट पर लेप करने से नारू कीड़े जो पेट में होते हैं वे मर कर मल के द्वारा बाहर निकल जाते हैं।

बांस के कोमल अंकुर की पुल्टिस पेट पर बांधने से पेट के कीड़े मर कर पेट से बाहर निकल जाते हैं।

मोर के पंख को जलाकर उसकी उसकी राख को गुड़ में मिलाकर गोली बनाकर खाने से पेट के कीड़े मर कर बाहर निकल जाते हैं।


पेचिश रोग Dysentery

 परिचय:-


पेचिश दस्त का ही एक रुप है। जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसके शरीर में कमजोरी आ जाती है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति की आंते कमजोर हो जाती हैं।

पेचिश रोग के लक्षण-


इस रोग से पीड़ित रोगी जब मलत्याग करता है तो उसके मल के साथ रक्त तथा तैलीय चिपचिपा पदार्थ भी निकलता रहता है।

जब रोगी व्यक्ति मलत्याग कर लेता है तब भी उसे ऐसा महसूस होता है कि उसे शौच फिर से आ रही है।

रोगी व्यक्ति के पेट में तेज दर्द होता है तथा उसे भूख भी कम लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को तेज प्यास लगती है और रोगी को शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी बुखार भी हो जाता है जो 104 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है।

पेचिश से पीड़ित रोगी के शरीर में आलस्य भरा रहता है तथा उसे किसी भी कार्य को करने का मन नहीं करता है। रोगी का मन हर समय बुझा-बुझा सा रहता है।

पेचिश रोग होने के कारण-


          यह रोग गलत भोजन का सेवन करने के कारण अधिक होता है। गलत भोजन (शुद्ध भोजन न होना) का सेवन करने के कारण व्यक्ति के शरीर में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तथा उसे कब्ज बनी रहती है जिसके कारण बड़ी आंत में घाव बन जाते हैं और इस घाव के भीतर इस रोग के कीटाणुओं का जन्म होता है इन्हीं कीटाणुओं के आधार पर एक अमीबिक पेचिश तथा दूसरी बैसीलरी पेचिश कहलाती है। जब अमीबिक पेचिश का रोग हो जाता है तो रोगी को बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो यह रोग बहुत धीरे-धीरे से ठीक होता है। बैसीलरी पेचिश का प्रभाव तेज होता है लेकिन उपचार करने पर यह जल्दी ही ठीक हो जाता है।


पेचिश रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


पेचिश रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके बड़ी आंत को साफ करना चाहिए। एनिमा क्रिया करने के बाद पेट पर गर्म ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा इसके बाद पेट पर गीले कपड़े की पट्टी या मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए। फिर रोग के रोग के अनुसार पट्टी की क्रिया कई बार करनी चाहिए। इसके परिणाम स्वरुप यह रोग ठीक हो जाता है।

पेचिश रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए। इसके बाद रोगी को दिन में एक बार गर्म पादस्नान करना चाहिए। फिर तौलिए से शरीर को पौंछना चाहिए। इस क्रिया को कुछ दिनों तक करने से यह रोग ठीक हो जाता है।

जब तक पेचिश रोग ठीक न हो जाए तब तक रोगी को उपवास रखना चाहिए और पानी में नींबू का रस मिलाकर पीते रहना चाहिए और फिर आवश्यकतानुसार 1 सप्ताह तक फलों का रस पीते रहना चाहिए और कुछ फलों को खाते भी रहना चाहिए जिसके परिणाम स्वरूप यह रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।

मट्ठे का प्रतिदिन अधिक मात्रा में सेवन करने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। इसके परिणामस्वरूप पेचिश रोग ठीक हो जाता है।

पेचिश रोग को ठीक करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सूर्यतप्त आसमानी बोतल का पानी पीना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन रात को सोते समय अपनी कमर पर भीगी चादर की लपेट देकर सोना चाहिए तथा सुबह के समय में हल्का व्यायाम करना चाहिए और सांस की कसरत करनी चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।

पेचिश रोग से पीड़ित रोगी को जब अपने पेट में ऐंठन तथा दर्द हो रहा हो तो पेट पर गर्म और फिर ठंडी सिंकाई करनी चाहिए। इस रोग में रोगी को पेट पर गर्म सिंकाई कम से कम 10 मिनट तक करनी चाहिए तथा इसके बाद 10 मिनट तक ठंडी सिंकाई करनी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप रोगी के पेट की ऐंठन तथा दर्द ठीक हो जाता है और उसका रोग भी जल्दी ठीक हो जाता है।

पेचिश रोग से पीड़ित रोगी के आंव से खून भी आ रहा हो तो उसे आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन 4 बार पीना चाहिए या फिर हरी और गहरी नीली बोतलों के सूर्यतप्त जल को बराबर मात्रा में लेकर आपस में मिलाकर, इसमें से 25 मिलीलीटर की मात्रा दिन में 4 बार लेनी चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप आंव से खून का आना बंद हो जाता है तथा पेचिश रोग भी जल्दी ही ठीक हो जाता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को दिन में 2-3 बार 6 ग्राम की मात्रा में ईसबगोल लेकर इसे पानी में कम से कम 10 घण्टे तक भिगोना चाहिए और फिर इसे पी लेना चाहिए। इसके फलस्वरूप आंतों की जलन ठीक हो जाती है ओर पेचिश रोग ठीक हो जाता है।

पीड़ित रोगी को जब तक आंव आना बंद न हो जाए तब तक उसे भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अधिक से अधिक फलों का रस तथा पानी पीना चाहिए।


जठराग्नि के मंद पड़ जाना Gastritis

 परिचय:-


इस रोग के कारण रोगी की पाचन का कार्य मंद पड़ जाता है जिसके कारण रोगी के शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और उसकी पाचन प्रणाली प्रभावित हो जाती है।

जठराग्नि के मंद पड़ जाने का लक्षण:-


इस रोग से पीड़ित रोगी को जी मिचलाना, पेट में अफारा, पेट में गैस बनना, पेट में दर्द तथा पेट में जलन होने जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

इस रोग से पीड़ित रोगी जब भोजन कर लेता है तब उसे थोड़ी-थोड़ी घबराहट सी महसूस होने लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खाया हुआ भोजन सही से पचता नहीं है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को उल्टी भी होने लगती है जिसके कारण से पचा हुआ भोजन बाहर आ जाता है तथा मल में खून के छींटे आने लगते हैं।

जठराग्नि के मंद पड़ जाने का कारण:-


यह रोग पेट के आन्तरिक भाग तथा नाजुक श्लेष्माकला अस्तर में सूजन आ जाने के कारण होता है।

औषधियों के जरूरत से ज्यादा सेवन करने तथा शारीरिक व मानसिक तनाव के कारण यह रोग होता है।

अधिक धूम्रपान करने,शराब पीने तथा नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने के कारण यह रोग होता है।

जठराग्नि के मंद पड़ जाने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


इस रोग का उपचार करने के लिए व्यक्ति को कम से कम 3 दिन तक नियमानुसार एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए तथा इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए।

इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपनी रक्त संचार प्रणाली में सुधार करना चाहिए और रक्त संचार प्रणाली में सुधार करने के लिए रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन 2-3 घण्टे तक अपने पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन ठंडे पानी से कटिस्नान करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को पेट में दर्द होने पर, दर्द से राहत पाने के लिए गैस्ट्रो-हैपेटिक लपेट का उपयोग करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट पर गर्म या ठंडी सिंकाई करनी चाहिए तथा कटिस्नान करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को उपचार कराने के लिए नियमित अंतराल पर बर्फ का ठंडा दूध पीना चाहिए तथा भोजन नहीं करना चाहिए और बर्फ के टुकड़े को चूसना चाहिए। इसके फलस्वरूप तुरंत ही इस रोग से राहत मिल जाती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को हानिकारक खाद्य पदार्थ जैसे कॉफी, औषधियां, शराब, धूम्रपान आदि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के उपयोग से रोग की अवस्था और खराब हो सकती है।


ग्रहणी शोथ Duodenitis

 परिचय:-


छोटी आंतों को तीन भागों में बांटा जा सकता है -


डुओडिनम (ग्रहनी)

जेजुनम (मध्यांत्र)

इलियम (रोशान्त्र)

          जब पची हुई प्रोटीन, पचे हुए कार्बोहाइड्रेट और अनछुई वसा पेट के आंतों में जाती है तो आंत्र रस की मदद से ये सभी पदार्थ पूरी तरह से पच जाते हैं। यह रस आंतों में होने वाले स्राव, पित्त अम्ल तथा अग्न्याशय के रस को आपस में मिला देते हैं। जब ये पदार्थ पच जाते हैं तो इलियम में आंत्र-अंकुर नामक विशेषीकृत संरचना के माध्यम के परिपाचन क्रिया करती है। इस प्रकार यदि अवशोषक पथ (आंत की नली) ठीक नहीं होती तो कई प्रकार के रोग आंतों को प्रभावित कर देते हैं जैसे- एंटेरिक ज्वर, डुओडेनाइटिस, टायफाइड तथा सिन्ड्रोम आदि।


डुओडेनाइटिस रोग के लक्षण:-


इस रोग से पीड़ित रोगी की आंत में डुओडेनाइटिस भाग के श्लेष्मकला अस्तर में सूजन आ जाती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी में जी मिचलाना, पेट में अफारा, पेट में गैस बनना, नाभि के दाहिनी ओर थोड़ा सा ऊपर के भाग में दर्द तथा पेट में जलन होने जैसे लक्षण नज़र आते हैं।

इस रोग से पीड़ित रोगी जब भोजन कर लेता है तब उसे कुछ घबराहट सी महसूस होने लगती है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को खाया हुआ भोजन सही से पचता नहीं है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को उल्टी होने लगती है जिससे पचा हुआ भोजन बाहर आ जाता है तथा मल में खून के छीटे आने लगते हैं।

डुओडेनाइटिस रोग होने के कारण:-


आंत के डुओडेनाइटिस भाग के श्लेष्मकला अस्तर में सूजन आ जाने के कारण से यह रोग हो जाता है।

औषधियों का जरूरत से ज्यादा सेवन करने तथा शारीरिक व मानसिक तनाव के कारण यह रोग हो जाता है।

अधिक ध्रूमपान करने, शराब पीने तथा नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने के कारण डुओडेनाइटिस का रोग हो जाता है।

डुओडेनाइटिस रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-


इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने शरीर की रक्त संचारण प्रणाली को सुधारना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर ठंडे लपेट तथा मिट्टी लपेट का उपयोग करना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम 20 मिनट तक ठण्डा कटिस्नान करना चाहिए तथा पाचनक्रिया के क्षेत्र में मांसपेशियों की काम करने की क्षमता को सुधारना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को सप्ताह में 1 बार उपवास रखना चाहिए तथा अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन अपने पेट की सफाई करने के लिए ठंडे पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए।

डुओडेनाइटिस रोग को ठीक करने के लिए ठंडे तथा गर्म लपेट का प्रयोग करना चाहिए। इसके बाद रोगी को ठंडे पानी से कटिस्नान करना चाहिए तथा गैस्ट्रो-हेपैटिक लपेट का उपयोग करना चाहिए। इससे दर्द जल्दी तथा रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

डुओडेनाइटिस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सोने से पहले उदरीय लपेट का उपयोग करने से लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को मिर्च-मसालेदार तथा उत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।


दस्त Diarrhoea

 परिचय:- हर व्यक्ति को कभी-कभी दस्त होना जरूरी भी है क्योंकि इससे पाचनक्रिया में जो गंदगी जमा होती है वह दस्त के रूप में शरीर के बाहर निकल जाती है इसलिए इसे दवाईयों से नहीं दबाना चाहिए नहीं तो यह जीर्ण रोग (असाध्य रोग) का रूप धारण कर सकता है। लेकिन जब यह किसी विषैले पदार्थ या किसी गंदगी के कारण से होता है तो यह एक बीमारी हो जाती है और उसका इलाज कराना जरूरी होता है।


दस्त होने के लक्षण: यह एक प्रकार का मल से सम्बन्धित रोग है जिसमें रोगी को बार-बार पतला मल आता है और इस पतले मल में बदबू भी आती है। इस रोग से पीड़ित रोगी को पेट में दर्द होता है, कभी-कभी उल्टियां होने लगती है तथा जी मिचलाने (मितली) लगता है। इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी सिर में दर्द तथा बुखार भी हो जाता है।


दस्त रोग के होने का कारण:


दस्त रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पाचनक्रिया का ठीक प्रकार से काम न करना है।  

अधिक भोजन, दूषित भोजन या गंदे पानी का सेवन करने से दस्त रोग हो सकता है।

पाचन प्रणाली में विषैले (जहरीले पदार्थ) पदार्थों के जमा हो जाने के कारण दस्त रोग हो सकता है।

दस्त रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-


दस्त रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले पानी तथा नींबू मिला हुआ पानी पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद जब रोगी के दस्त बंद हो जाए तो उसे रसाहार पतला मठ्ठा, गाजर, सेब तथा अनार का रस पीना चाहिए।

दस्त रोग से पीड़ित रोगी को नारियल का पानी और चावल का पानी पिलाना काफी फायदेमंद होता है।

दस्त रोग से पीड़ित रोगी को थोड़ी सी हल्दी पानी में मिलाकर या छाछ में मिलाकर पीने से बहुत लाभ मिलता है।

दस्त रोग से पीड़ित रोगी को नींबू का एनिमा या छाछ का एनिमा देना चाहिए और इसके बाद उसके पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी का लेप लगाना चाहिए। इस पट्टी को 2-2 घण्टे के बाद बदलते रहना चाहिए तथा फिर कुछ देर बाद उसे कटिस्नान कराना चाहिए। इस प्रकार से रोगी व्यक्ति का इलाज करने से दस्त रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

यदि दस्त रोग काफी पुराना हो गया हो तो जब तक रोग कम न हो जाए तब तक रोगी को मट्ठा पीते रहना चाहिए और उसके बाद थोड़ी सी किशमिश भी खाते रहना चाहिए। यदि भूख बढ़ जाए तो किशमिश कम खानी चाहिए। इसके बाद रोगी को दोपहर के समय में दलिया और सब्जी खानी चाहिए।

यदि रोगी व्यक्ति को दस्त के साथ उल्टी भी हो रही हो तो उसे तुरंत उपवास रखना चाहिए और कागजी नींबू के रस को पानी में मिलाकर पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी रखनी चाहिए।

यदि रोगी का जी मिचला रहा हो तो उसे हल्का गर्म पानी पीकर उल्टी कर देनी चाहिए ताकि उसका पेट साफ हो जाए।

रोगी व्यक्ति को अपने इस रोग का उपचार करने के लिए प्रतिदिन बर्फ के ठंडे पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए ताकि पेट साफ हो सके। इसके साथ रोगी को नींबू का पानी पीकर उपवास रखना चाहिए।

रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक 2 घण्टे के अंतराल पर मिट्टी का लेप या तौलिया अपने पेट पर लपेटना चाहिए। इसके फलस्वरूप यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।